Tuesday, November 20, 2018

विंध्य के तीन दिलचस्प मुकाबले: 3 हाईप्रोफाइल चेहरे अपने गढ़ बचाने में जुटे

अमरन नदी के किनारे नागौद रियासत का खूबसूरत किला मध्यकालीन स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना है। भरहुत पत्थरों से बने इस किले के पास ही उड़दान गांव है। गांव के दलित मोहल्ले में एक कुर्सी पर नागौद रियासत के वंशज नागेन्द्र सिंह बैठे हैं। नीचे फर्श पर मोहल्ले के कुछ लोग बैठे हैं। गली में दलित नवयुवकों का जमावड़ा है।

उनकी शिकायत है कि पढ़ाई-लिखाई करने के बाद भी उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है। एक महिला अपनी पेंशन बंद होने की शिकायत लेकर आई है। सबका कुछ न कुछ रोना है। लगता है ऐसी ही शिकायतों से निपटने के लिए भाजपा ने यहां से नागेन्द्र सिंह को मैदान में उतारा है, जो शिवराज सिंह चौहान की पिछली सरकार में मंत्री थे। फिलहाल वे खजुराहो से सांसद हैं। उनके सामने कांग्रेस के मौजूदा विधायक यादवेन्द्र सिंह को हराने की चुनौती है।

दोनों मुख्य उम्मीदवार राजपूत हैं। इलाके में पिछले पांच साल से जमावट कर रहीं भाजपा नेता रश्मि पटेल बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ रही हैं। वे अपनी पुरानी पार्टी को नुकसान पहुंचाएगी। नागेन्द्र सिंह का कहना है कि वे खुद चाहते थे कि किसी और को टिकट मिले। इस बारे में उन्होंने सीएम को एक चिठ्ठी भी लिखी थी। 9 अक्टूबर 2018 को लिखी उस चिठ्ठी की एक फोटोकॉपी वे साथ लेकर चल रहे हैं। वे मौजूदा लोगों को उसे पढ़कर सुनाते भी हैं। जाहिर है चुनौती कड़ी है।

दलितों की शिकायत से नागेन्द्र सिंह क्षुब्ध नजर आ रहे हैं। "हम योजनायें तो बड़ी अच्छी बना लेते हैं, पर उन्हें ठीक से लागू नहीं कर सकते,' वे कहते हैं, “मेरी राय में अब नए स्कीम लाने की जगह हमें पुरानी स्कीमों पर ही ठीक से काम करना चाहिए।” 1977 में पहला चुनाव जीते नागेन्द्र सिंह ने आज तक केवल दो बार पराजय का मुंह देखा है।

नागेन्द्र का चुनाव विंध्य में सबसे दिलचस्प मुकाबलों में एक हो गया है, क्योंकि उनका पूरा खानदान ही राजनीति में है। उनके दो भाई एमएलए रह चुके हैं, एक भाई की बहू नगर पंचायत अध्यक्ष थी और भतीजा जनपद का। रीवा भले ही विंध्य की राजनीतिक राजधानी हो, पर सतना यहां का आर्थिक केंद्र है। विंध्य के सबसे दिलचस्प मुकाबले भी यहीं लड़े जा रहे हैं।

नागोद से महज 50 किलोमीटर दूर रामपुर बघेलान के भाजपा उम्मीदवार विक्रम सिंह के पास भले ही कोई किला न हो, पर एक मजबूत राजनीतिक विरासत है। नेहरु-गांधी परिवार की तरह ही उनके परिवार की भी चौथी पीढ़ी पॉलिटिक्स में है। परदादा अवधेश प्रताप सिंह विंध्य प्रदेश के प्रधानमंत्री थे (तब यही पदनाम था), दादा गोविन्द नारायण सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे और पिता हर्ष सिंह अभी भी भाजपा सरकार में मंत्री हैं। बीमारी के वजह से हर्ष सिंह का टिकट उनके बेटे को दिया गया। उनका मुकाबला बसपा के रामलखन पटेल से है, जो पिछला चुनाव 25 हजार वोटों के अंतर से हारे थे। एंटी इनकम्बेंसी की वजह से इस बार विक्की भैया की राह आसान नहीं।

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