Monday, January 7, 2019

मेघालय: जो लोग अवैध खदान में फंसे हैं, उनके परिवार किस हाल में हैं

फिर ख़बर आई कि जो 15 लोग कसान के अवैध कोयला खदान में पानी भरने से पिछले 13 दिसंबर से फंसे हुए हैं, उनमें ये सात लोग भी हैं. गाँव के लोग परेशान हैं क्योंकि जिस जगह ये लोग काम करने गए थे वो मागुरबारी से लगभग 850 किलोमीटर दूर है.

फंसे हुए लोग किस स्थिति में है, इतने दिन बाद भी सरकारी मशनरी इस बात का पता नहीं लगा पाई है.

इनकी ख़ैर ख़बर लेने गाँव के कुछ लोग घटनास्थल पर जाते रहते थे, लेकिन अब उनका सब्र भी जवाब दे जा रहा है. अचानक आई इस विपदा से यहाँ के लोग समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं.

लेकिन खदान में फंसे सात लोगों के परिवार अभी भी उनकी वापसी के सपने देख रहा है. पिछले 13 दिसंबर से वो जिस 'अच्छी ख़बर' की आस लगाए बैठे हैं, अब उस पर तेज़ी से नाउम्मीदी का साया मंडराने लगा है.

मेघालय की इन अवैध खदानों में 'रैट होल माइनिंग' के ज़रिये कोयला निकाला जाता है.

राज्य सरकार पर आरोप है कि उसने रहत और बचाव कार्यों को शुरू करने में काफ़ी देर कर दी.

मागुरमारी के लोग परेशान हैं क्योंकि अब खदान में पानी भरे कई दिन बीत चुके हैं लेकिन राहत दल फंसे हुए मज़दूरों तक पहुँचने में नाकाम रहा है. कोल इंडिया लिमिटेड के महाप्रबंधक जुगल बोरा कहते हैं कि इन इलाक़ों के कोई मैप नहीं हैं इसलिए बचाव कार्यों में परेशानियां आ रही हैं.

मागुरमारी गाँव के दो भाई उमर अली और शराफ़त अली का परिवार उनका इंतज़ार कर रहा है. इस घर में सिर्फ़ औरतें और बच्चे ही रह रहे हैं क्योंकि कमाने वाले लोग तो 850 किलोमीटर दूर ज़मीन के कई फीट नीचे फंसे हुए हैं.

उमर अली की पत्नी सेपाली बेगम कहती हैं कि गाँव में ही रहने वाला एक माइनिंग सरदार उनके पति और देवर को अपने साथ काम दिलाने की बात कह कर ले गया था.

हादसे के बाद से माइनिंग सरदार फ़रार है.

शराफ़त अली की पत्नी साहिबा बेगम अपने एक बेटे और बेटी के साथ इसी घर में रहती हैं.

वो कहती हैं कि उनके पति पहली बार इस तरह का काम करने इतनी दूर गए थे. उनका कहना था कि बहुत मना करने के बावजूद भी वो बहकावे में आकर चले गए.

घटना की ख़बर उन्हें गाँव के लोगों ने आकर दी. इस घर में अब कोई दूसरा कमाने वाला नहीं है.

खदान में फंसे एक और मज़दूर रियाजुल के पिता सहर अली अपने बेटे को याद करते हुए कहते हैं कि उनके बुढ़ापे का सहारा कब घर लौटेगा. वो उसकी आस लगाए बैठे हैं लेकिन अभी तक उनको मायूसी का ही सामना करना पड़ रहा है.

ऐसे ही एक 'रैट होल' में काम कर चुके अब्दुल करीम अब अपाहिज हो गए हैं. खदान में काम के दौरान उनपर कोयले का बड़ा अम्बार आ गिरा था, जिस कारण उनकी रीढ़ की हड्डी टूट गयी थी.

उनके बड़े भाई अब्दुल कलाम भी कसान के उसी कोयला खदान में फंसे हुए हैं.

बीबीसी से बात करते हुए अब्दुल करीम कहते हैं कि उनके इलाक़े में रोज़गार के साधन नहीं हैं. "खेती करना भी घाटे का सौदा है. अगर दूसरों के खेतों में काम करने जाते हैं तो दिहाड़ी 200 से 250 रुपए प्रति दिन के आसपास ही मिल पाती है."

"खदान में मज़दूरी ज़्यादा मिलती है. एक दिन का 3000 रूपए तक मिलता है. इसलिए लोग ज़्यादा पैसे कमाने वहां चले जाते हैं. जिस तरह चूहा अपना बिल बनाता है, यहाँ की खदानों में उसी तरह का काम होता है. इसलिए फंसे लोगों को बचाना बड़ी चुनौती है."

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